राष्ट्रवाद खूब बिकता है लेकिन....?

राष्ट्रवाद खूब बिकता है लेकिन....?
हिज्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद मीडिया एक बार फिर उन्मादग्रस्त हो गया है। अंधराष्ट्रवाद का ऐसा बुखार उस पर चढ़ा है कि दिन-रात वह सन्निपात में चीख-पुकार मचाता रहता है। वह जटिल समस्या को सरलीकृत करके पूरी घाटी को इस तरह से पेश कर रहा है मानो वहाँ का हर नागरिक दुश्मन हों और उन्हें दबा-कुचलकर ख़त्म कर दिया जाना चाहिए। उनके इस रवैये ने न केवल कश्मीर में गुस्से को भड़काया, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्ख़ियों में ला दिया। पाकिस्तान तो भला ऐसे मौक़े को क्यों छोड़ता, लिहाज़ा उसने भी इसे दुहना शुरू कर दिया। आलम ये है कि कश्मीर हाथ से फिसलता हुआ दिख रहा है। निस्संदेह, समस्या के बिगड़ने में केंद्र और राज्य की गठबंधन सरकार की अपरिपक्वता एवं अकुशलता का हाथ ज़्यादा है। वानी को नायक बनाने के लिए वह मीडिया को दोषी ठहराने में लगी हैं, मगर सचाई तो ये है कि समस्या से निपटने के तौर-तरीकों ने कश्मीरी अवाम को वानी से एकदम से जोड़ दिया और वह लगातार हीरो बनता चला गया। Read More at Deshkaal.com
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